

वेदांग चक्षु www.vedandchakshu.com
मनीषियों द्वारा रचित चार वेद है एवं छ: वेदांग है उनमे से छठा वेदांग ज्योतिष है इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार से की गई है :-
ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्|
अर्थात्- ज्योतिष सूर्य आदि ग्रहों के बारे में बताने वाला शास्त्र है | ज्योतिष विषय वेदों जितना ही प्राचीन है। प्राचीन काल में ग्रह, नक्षत्र और अन्य खगोलीय पिण्डों का अध्ययन करने के विषय को ही ज्योतिष कहा गया था।
यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा ।
तद् वेदांगशास्त्राणां , ज्योतिषं मूर्धानि स्थितम् ||
अर्थात्- जिस प्रकार मौर के सिर पर शिखा, सर्प के सिर पर मणि का स्थान है उसी प्रकार वेदांगों में ज्योतिष का स्थान माना गया है|
वेदेषु विद्यासु च ये प्रदिष्टा ,
धर्मादयः काल विशेषतोअर्था: ।
ते सिद्धि मायान्त्यखिलाश्च येन ,
तद् वेद नेत्रं जयतीह लोके ।।
अर्थात् - वेदों में तथा अन्य विद्याओं में काल विशेष पर आधारित जो धर्म कर्मादि निर्दिष्ट हैं वे सभी जिस विद्या के प्रभाव से सिद्ध
होते हैं वेद के नेत्र स्वरुप उस ज्योतिष शास्त्र की इस संसार में जय हो |-(महर्षि आर्ष्टिषेणि, ज्योतिर्निबन्ध )
इसी लिए ज्योतिष को वेदांग चक्षु भी कहा जाता है|
Mahendra Vyas ( Astrologer)


